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darkroom notes

Resolution and detail

Resolution:-

 Film के matrix में प्रयुक्त pixel के परस्पर अनुपात के कारण films की ability में प्रभाव पड़ता है। इन pixels के कारण films पर blacking एवं whitening पर्याप्त अनुपात में प्रात्त होती है। पिक्सल के पर्याप्त अनुपात में फिल्मों की दक्षता के अनुरूप प्रास् इमेज की गुणवत्ता resolution  कहते है। Resolution की Ability-pixel के आकार पर निर्भर करती है। Pixel  size जितना छोटा होगा, film की quality में resolution उतना ही अधिक होगा। अर्थात् उतनी ही अच्छी इमेज प्राप्त होती है। अलग-अलग प्रकार की फिल्मों का Resolution भी अलग-अलग होता है।

  Detail-:

 एक्सरे फिल्म पर शरीर की आंतरिक संरचनाओं की अधिक से अधिक information प्राप्त होना detail कहलाता है | यह Contrast एवं Resolution के अनुपात पर निर्भर करता है ।तथा साथ-ही-साथ मरीज के स्केन किये जाने चाले Organ की thickness पर भी निर्भर करता है ।

Contrast

Contrast 

X-ray films पर ऑप्टिमम डेंसिटी में प्राप्त ब्लैकनेस एवं whitness का अनुपात कंट्रास्ट कहलाता है । एक अच्छी इमेज कंट्रास्ट पर निर्भर करती है । इससे किसी बीमारी के डायग्नोसिस में आसानी होती हैं ।
यह दो प्रकार का होता है -

1 subject contrast

इस प्रकार का contrast एनाटॉमिकल स्ट्रक्चर की मोटाई पर निर्भर करता है ।तथा साथ ही साथ एनाटॉमिकल स्ट्रक्चर की डेंसिटी पर भी निर्भर करता है। यदि एनाटॉमिकल स्ट्रक्चर की डेंसिटी एवं एटॉमिक नंबर increase होगा तो रेडियोग्राफी कॉन्ट्रैक्ट भी increase होगा ।इस प्रकार का कॉन्ट्रास्ट सब्जेक्ट contrast कहलाता है।इसे रेडिएशन contrast भी कहते हैं ।  अर्थार्त एकसमान xray बीम द्वारा एकसमान मोटाई तथा अलग अलग घनत्व के ऑब्जेक्ट के कारण xray फ़िल्म की इमेज की डेंसिटी के अंतर को सब्जेक्ट कंट्रास्ट कहते हैं । 

2. Film contrast 

यह फिल्म की क्षमता पर निर्भर करता है तथा फिल्मों में प्रयुक्त होने वाले इमल्शन के प्रकार पर निर्भर करता है । high ability फिल्म में contrast  भी उच्च स्तर का होता है ।  फिल्म की एबिलिटी का पता characteristics curve  के द्वारा लगाया जाता है । फिल्मों की डेंसिटी तथा एक्स्पोजर का अनुपात  characteristics curve  कहलाता है।


Contrast निम्न बातों पर निर्भर करता है -

1. Amount of radiation
2. Age of solution 
3. Temperature 
4. Thickness of the patients
5. Sufficient x-ray machine
6. Using of different type of film
7. Using of different type of screen.

Film fog

Film fog

यदि एनेक्स अपोजिट एक्स-रे फिल्म में अवांछित प्रकार की डेंसिटी पाई जाती है तो इससे फिल्म को कहते हैं यदि भोग लेवल अधिक हो तो रेडियोग्राफिक इमेज का कॉन्ट्रैक्ट कम हो जाता है व  poor detail होती है। 

कारण(causes)

 फ़िल्म फोग  प्लास्टिक बेस  के रंग व घनत्व के कारण व unexposed silver halide क्रिस्टल के डेवेलपमेंट के कारण होता है। ऐसा unexposed फ़िल्म की ठीक प्रकार से स्टोरेज न होने से होता है।
करणो के आधार पर फ़िल्म फोग के निम्न प्रकार है

1. Photographic fog

यदि फ़िल्म बहुत पुरानी व एक्सपायरी date निकल चुकी हो तो फ़िल्म पर फोटोग्राफीक फोग उतपन्न होता है ।

2. Light fog

 dark room मैं अनसूटेबल सेफ लाइट के प्रयोग से उत्पन्न व फिल्म के सेफ लाइट में दीर्घ अवधि तक एक्सपोजर के कारण लाइट फोग उत्पन्न होता है ।

3. Radiation fog 

यदि स्टोर की गई फिल्म रेडियो सक्रिय पदार्थों के संपर्क में आती है तो रेडिएशन फोग  उत्पन्न होता है । डार्क रूम में रेडिएशन प्रोटक्शन की कमी के कारण । 

4. Oxidation fog

  फिल्म इमल्शन के हवा के साथ क्रिया करने पर oxidation fog का निर्माण होता है ।  प्रोसेसिंग सोल्यूशन को दीर्घ अवधि तक खुले में रखा हो तो यह क्रिया होती है । 

5. Chemical fog 

फिल्म को तय समय से अधिक टाइम तक डेवलपर सोल्यूशन में रखा जाता है या अधिक तापमान वाले डेवलपर सोल्यूशन में रखा जाता है तो  केमिकल फोग उत्पन होता है ।

6. Color fog

डेवलपमेंट के बाद फिल्म की सही तरीके से वाशिंग नहीं करने से डिवेलपर व फिक्सर सॉल्यूशन में रिएक्शन होने तथा  पुराने फिक्सर सोल्यूशन का प्रयोग करने से color fog उतपन्न होता है ।

Characteristics of x-ray film

Characteristics of x-ray film

1. Density-: 

Density  का तात्पर्य फिल्म के ऊपर डार्कनेस से हैं जितनी फिल्म के ऊपर डार्कनेस होगी उतनी ही फिल्म की डेंसिटी अधिक होगी । डेंसिटी एक्स्पोज़र पर डिपेंड करती है जितनी अमाउंट में रेडिएशन फिल्म के द्वारा रिसीव की जाएगी फ़िल्म पर डेंसिटी उतनी ही अधिक होगी । फिल्म की  blackness को measure करने को ऑप्टिकल डेंसिटी कहते हैं ।
जो निम्न चित्र के द्वारा परिभाषित की जाती है ।

Characteristics of x-ray film






रेडियोलोजी के अंदर सामान्यतः 0.25-2.0 optical density use में लेते हैं । 
फ़िल्म की डेंसिटी निम्न पर निर्भर करती है।
A. Quantity of x-ray beam-: 
बीम की Quantity का मतलब xray फोटोन की संख्या से है। x ray tube के अंदर current/धारा का मान बढ़ाने पर इलेक्ट्रॉनों का प्रोडक्शन भी ज्यादा होगा जिससे कि xray फोटोन की संख्या में भी वृद्वि होगी। और फ़िल्म की डेंसिटी भी increase होगी । जिससे पेशेंट dose भी ज्यादा लगेगा । अतः बीम की Quantity बढ़ने पर डेंसिटी भी बढ़ेगी । 
B. Quality of x-ray beam
X-ray beam की Quality भेदन क्षमता ( penetrating power ) को व्यक्त करती है। यदि Kv increase करने पर tissue से ज्यादा मात्रा में xrays penetrate होगी।और फ़िल्म तक पहुंचेंगे जिससे फ़िल्म ज्यादा डार्क होगी । और फ़िल्म की डेंसिटी भी बढ़ेगी । अतः xray बीम की Quality बढ़ाने पर डेंसिटी भी बढ़ेगी ।

2. Object density

यदि object की डेंसिटी ज्यादा होगी तो फ़िल्म की डेंसिटी कम होगी । क्योंकि पेशेंट की डेंसिटी या मोटाई ज्यादा होगी तो xray का absorption अधिक होगा जिससे कम xrays फ़िल्म तक पहुंचेगी । जिससे फ़िल्म पर ब्लैकनेस भी कम उतपन्न होगी । 

3. Film fog

Film fog के कारण डेंसिटी कम होती है । जो improper safe लाइट के कारण प्रोड्यूस हो सकता है । 

4. Exposure 

Exposure के साथ साथ डेंसिटी भी बढ़ती है ।

Preparing the processing tank

Preparing the processing tank

1. फिल्म को प्रोसेस करने के लिए काम में आने वाला केमिकल कांच या प्लास्टिक की बोतल में डिलीवरी होता है । यह एक सोल्यूशन होता है जिसमें पहले से ही पानी मिला हुआ होता है। box  और tin ने उपलब्ध सॉल्यूशन सॉलिड(ठोस) होता है। तथा इसमें पानी मिला हुआ नहीं होता है । प्रत्येक डेवलपर और फिक्सर की बोतल पर साफ-साफ लिखा होना चाहिए कि डेवलपर पर D तथा फिक्सर पर F   केमिकल्स को डार्क रूम के बाहर मिक्स करना चाहिए जो की एक  अच्छा वेंटिलेट रूम होना चाहिए। क्योंकि मिक्सिंग के दौरान बनने वाला धुंआ आपके lungs को खराब कर सकता है।
2. केमिकल मिक्सिंग के लिए स्पेशल बकेट और हिलाने के लिए स्पेशल रोड की का उपयोग कीया जाना चाहिए । बकेट्स और मिक्सिंग रोड पर मार्केट होना चाहिए कि डेवलपर में काम आने वाले पर D तथा फ़िक्सर के काम आने वाले पर F लिखा होना चाहिए । बोतल ओर बकेट पर लिखे इंस्ट्रक्शन को पढ़ते  हुए केमिकल्स को वाटर में मिक्स करके सोल्यूशन तैयार करते है। 3.ध्यान रखना चाहिए की केमिकल मिक्स करते समय फर्श तथा कपड़े  पर धब्बे नहीं पड़ने चाहिए । केमिकल इन्हें डैमेज कर देता है स्क्रीन पर केमिकल गिरने पर उसे हाथों-हाथ साफ कर लेना चाहिए।
4. डार्क रूम के अंदर डेवलपिंग एंड फिक्सिंग टैंक अच्छी तरह साफ होने चाहिए । जब टैंक में भरा हुआ सोलुशन पुराना हो जाये तो केमिकल टैंक में से सोलुशन को खाली कर देते हैं । केमिकल टैंक को साफ करने के लिए पानी तथा वाशिंग सॉल्यूशन का उपयोग  नहीं करते हैं । टैंक  को पूरी तरह साफ करने के बाद उन्हें  प्रोसेसिंग टैंक के अंदर रख दिया जाता है। 
5.अब फ्रेश डेवलपर एंड फ़िक्सर से भरी बकेट को डार्करूम में लाते हैं तथा डेवलपर तथा फ़िक्सर को भर देते हैं । एक्स्ट्रा डेवलपर तथा फिक्सर को बोतल में स्टोरेज करते हैं तथा डेवलपर पर D तथा फ़िक्सर पर F मार्केड करते हैं। इन बोतल को डार्क रूम में एक निश्चित स्थान पर रख देते हैं ।
6. प्रोसेसिंग टैंक में वाटर का स्तर 2 सेंटीमीटर ऊपर से कम होना चाहिए । एक ढक्कन डेवलपर पर तथा दूसरा फिक्सिंग टैंक पर ढक देते हैं ।
7. इसके बाद डार्क रूम के फर्श को साफ करते हैं । जहां पर केमिकल सोल्युशन  के धब्बे गिरे हुए हैं उनको साफ करते हैं ।टाइल्स और प्रोसेसिंग टैंक  के चारों ओर के एरिया को साफ कपड़े से साफ करते हैं। इसके बाद अपने हाथों को साबुन तथा पानी से अच्छी तरह से साफ कर लेते हैं। 
8.इसके बाद टैंक में केमिकल का लेवल बनाए रखने के लिए स्टोरेज बोतल में भरे केमिकल से कुछ दिनों के अंतराल से लेवल को बनाए रखते हैं ।

Maintenance of the processing tank

Maintenance of the processing tank

Processing tank  मैं developer और  fixer सोल्यूशन को भरा हुआ रखा जाता है । तथा वाटर को rinsing  और वाशिंग के लिए प्रोसेसिंग टैंक में ही भरा रहता है।  डेवलपर और फिक्सर सॉल्यूशन को रेगुलरली चेंज करते हुए रहना चाहिए। जिससे कि यह solution  कमजोर ना हो सके। यह केमिकल स्किन और कपड़े को डैमेज या खराब कर देता है अतः केमिकल का कोई भी धब्बा पड़ने पर उसे immediately साफ कर लेना चाहिए । कुछ महत्वपूर्ण बिंदु निम्न है जिन्हें फॉलो करते हुए प्रोसेसिंग टैंक का रूटीन मेंटेनेंस करना चाहिए- 
1.प्रत्येक दिन कोई भी फिल्म की प्रोसेसिंग करने से पहले डेवलपर और फिक्सर सोल्यूशन को हिलाना चाहिए यह प्रक्रिया स्पेशल रोड्स के द्वारा की जाती है जो कि डेवलपर तथा फिक्सर के लिए प्रोवाइड की हुई होती है इनके लिए अलग-अलग रोड्स काम में ली जाती है डेवलपिंग रोड को सिर्फ डेवलपर सोलुशन को हिलाने के लिये तथा फ़िक्सर रोड् को सिर्फ फ़िक्सर को हिलाने के लिए ।
2. यदि दोनों सोलुशन के लिये एक ही रोड का उपयोग करेंगे तो दोनों सोलुशन आपस मे मिक्स हो जाएंगे । जिससे कि सोलुशन की पावर/कार्यशीलता पर प्रभाव पड़ेगा । दो सोल्युशन को मिलाने के लिये किसी अन्य रोड का उपयोग करना चाहिए। डेवलपिंग टैंक में  केवल डेवलपर तथा  फिक्सर टैंक में  केवल फिक्सर ही भरा जाना चाहिए । तथा हर समय फुल होना चाहिए ।
3. एक्स्ट्रा डेवलपर एंड फिक्सर को  अलग से बोतल में डार्क रूम के अंदर ही रखना चाहिए । डेवलपर और फ़िक्सर सोल्युशन से भरे दोनों tanks को प्रत्येक महीने के अंतराल से कंप्लीट बदलना  करना चाहिए । महीने में बहुत कम फिल्मे अगर प्रोसेस की गई  हो तो सोलुशन को कुछ दिन बाद भी बदल सकते हैं ।
4. प्रोसेसिंग टैंक में rinsing के लिए काम में लिया जाने वाला वाटर प्रत्येक दिन कंपलीटली चेंज करना चाहिए तथा टैंक को वापस से फुल भर देना चाहिए। फिल्म को फिक्सिंग के बाद वाशिंग करने के लिए रनिंग वाटर काम में लिया जाता है क्योंकि इसके लिए लार्ज वाटर टैंक  को daily खाली करना वापस भरना संभव नहीं है। तथा dirty water जिसमें केमिकल मिले हो फ़िल्म को  खराब कर देते हैं जिससे कि पैसा और टाइम दोनों बर्बाद होते हैं। 
5. केमिकल सोल्यूशन तथा rinsing एंड वाटर का तापमान एकसमान रहना चाहिए । चेक करना चाहिए कि रनिंग वाटर टैंक के अंदर शाम के समय यदि पानी गर्म हो जाए तो इसके लिए अन्य अन्य कोल्ड वाटर नही मिलाना  चाहिए । इस वाटर को प्रत्येक सुबह में बदलना अच्छा रहता है जहां तक संभव हो सके तो पानी वाटर टैंक के अंदर क्लीन ही आना चाहिए वाटर टैंक के अंदर से वाटर टैंक का तल देख सकें।

darkroom Record keeping and filling

Record keeping and filling

प्रत्येक रेडियोलोजी डिपार्टमेंट  निम्न रेकॉर्ड रखता है ।

1. Record register

 रिकॉर्ड रजिस्टर में कैसेट का नाम और पर्सनल डिटेल लिखी जाती है। type of x-ray एग्जामिनेशन और अवेलेबल डायग्नोसिस को भी रिकॉर्ड रजिस्टर में लिखा जाता है । जो पेशेंट रजिस्टर के अनुसार होता है। प्रत्येक पेशेंट की एक्स-रे फिल्म को x-ray फिल्म फाइल में रखा जाता है । यह फिल्म 5 साल तक रिकॉर्ड में रखी जाती है। प्रत्येक महीने में काम मे ली गई फिल्म की संख्या साइज के अनुसार और यूज्ड केमिकल प्रत्येक महीने और दवाओं का उपयोग (सप्लाई रिकॉर्ड के अनुसार) डिटेल में रिकॉर्ड रखा जाता है। 

The patient register

पेशेंट का रिकॉर्ड एक रजिस्टर में लिखा जाता है जिसे पेशेंट रजिस्टर्ड कहते हैं।
 इसमें एंट्रीज कॉलम बने होते हैं इन कॉलम के अनुसार एंट्री की जाती है । पेशेंट रजिस्टर प्रत्येक दिन एक्स-रे ऑपरेटर के द्वारा कंप्लीटेड रखा जाता है । रिकॉर्ड बहुत महत्वपूर्ण है ।  यह रिकॉर्ड बहुत  हेल्पफुल होता है प्रत्येक डॉक्टर , एग्जामिनेशन और गुड केयर ऑफ द पेशेंट के लिए ।
the column heading should include
1.वर्तमान परीक्षा की तारीख।
2. मरीज के परिवार का नाम , तथा मरीज का पहला नाम।
3. मरीजों के अस्पताल का नंबर।
4. रोगी की जन्मतिथि और सेक्स ।
5. एक्स-रे examination का प्रकार ।
6. X-ray का अनुरोध करने वाले डॉक्टर का नाम । 
7. प्रत्येक आकार में उपयोग की गई फिल्म की संख्या।
8. The diagnosis made from the films.
darkroom Record keeping and filling




it is a good idea to categorize the envelopes by year. this can be done by sticking a small coloured tab on the other bottom cornes of each envelope using a differrent colour for each year. when the patient returns for more ray the tab is changed to indicate the current year . only one colour code should show on any envelope for example.

Characteristic/ H & D curve in radiology

Characteristic/ H & D curve

ऑप्टिकल डेंसिटी तथा एक्सपोज़र मध्य एक ग्राफ खींचा जाता है जिसे Characteristic curve या H and D curve कहते हैं ।  सन  1890 में F Hurter और V.C driffield नामक वैज्ञानिको प्रकाशित करवाया इसलिये  इसको नाम H and D curve  कहते हैं ।इस curve में फ़िल्म की डेंसिटी को वर्टीकल एक्सिस ( Y- अक्ष ) पर तथा फ़िल्म पर दिया गया एक्सपोज़र  हॉरिजॉन्टल एक्सिस (x- अक्ष ) पर खींचा जाता है । यह curve "S" आकृति का प्राप्त होता है । फ़िल्म के ऊपर अलग अलग एक्सपोज़र देकर फ़िल्म को डेवलप  करके फ़िल्म की डेंसिटी को देखकर एक्सपोज़र तथा डेंसिटी के मध्य यह ग्राफ खींचा जाता है । characteristics curve के द्वारा फ़िल्म की xray फोटोन के प्रति सेंसिटिविटी तथा कंट्रास्ट तथा latitude का पता चल जाता है। यह curve फ़िल्म के इमल्शन तथा प्रोसेसिंग सोल्युशन पर निर्भर करता है ।
इस ग्राफ के तीन भाग होते हैं जो निम्न है-

1. The toe 

Toe वह भाग होता है जंहा पर low एक्सपोज़र होती है। toe के नीचे वाला region फ़िल्म फोग डेंसिटी से 0.25 होता है । फ़िल्म फोग डेंसिटी से 0.25 तक किसी भी प्रकार की रेडिएशन का एक्सपोज़र नही होता है । और यह डेंसिटी इमेज के लिये उपयोगी नही होती है ।


Characteristic/ H & D curve in radiology




2. The gamma/straight line 

Straight line को फ़िल्म gamma भी कहते हैं । इस region के अंदर डेंसिटी तथा एक्सपोज़र के मध्य एक सीधी रेखा में ग्राफ प्राप्त होता है अर्थात एक्सपोज़र बढ़ाने पर डेंसिटी भी बढ़ेगी । यह toe तथा shoulder के बीच वाला भाग होता है । 

3. The shoulder 

इस curve के upper most पार्ट को shoulder कहते हैं । इस region पर डेंसिटी maximum होती है । जिसे Dmax के द्वारा व्यक्त किया जाता है । इस portion में एक्सपोज़र बढ़ाने पर डेंसिटी नही बढ़ेगी । और अधिक एक्सपोज़र पर डेंसिटी भी कम होती जाएगी ।

Characteristics curve  से प्राप्त वेल्यू 

1. Characteristics curve  से फ़िल्म स्पीड व एक्सपोज़र index प्राप्त किया जाता हैं । 
2. फोटोग्राफिक इमेज का contrast ज्ञात करने के लिये दो measure का प्रयोग होता है ।
● gamma gradient ( y ) -: curve की straight line की ढाल ।
● Average gradient ( a ) -: curve की  straight  line के किन्ही दो बिंदुओं के मध्य की ढाल ।
3. Minimum and maximum density
● न्यूनतम घनत्व -: least possible amount of blackening in unexposed part of the film.
● minimum density -: Development fog density + base density

Factors Affecting Developer & Fixer


 Developer & Fixer बहुत ही sensitive होते है, वातावरणीय एव मानवीय कारकों का इन पर बहुत प्रभाव पड़ता है। Developer एव fixer को प्रभावित करने वाले निम्नलिखित कारक होते हैः 

1.Temperature:-

Darkroom का temperature सामानय: 18-24℃ होता है। बहुत अधिक तापमान पर एवं बहुत कम तापमान पर इन solution की क्रियाशीलता में प्रभाव पड़ता है अधिक तापमान से इन solution में विद्यमान Carbonic Redusing Agent एवं अन्य सभी Agent कार्य करने में शिथिल(धीमे) हो जाते है जिससे Developing time घट या बढ़ जाता है। जिससे film की quality पर प्रभाव पड़ता है अत: Dark Room का Temperature सामान्य रहना चाहिए । सर्दियों में ये सोल्यूशन बहुत अधिक ठण्डे हो जाते है। जिससे की प्रोसेसिंग टाइम बढ़ जाता है। अतः सर्दियों के दिनों में Metallic Rod का उपयोग कर इन solution को गर्म किया जा सकता है। 

2. Air:-

Air की वजह से इन solution पर विपरीत प्रभाव पड़ता है यदि Developer में O2 मिल जाएगी तो Developer ऑक्सीकृत हो जाता है एवं ऑक्सीकृत Developer भूरे रंग का हो जाता है। सोडियम सल्फाइड Developer को oxidation से बचाता है। अत: dark room में काम करते समय हमेशा इन solution को ढ़ककर रखना चाहिए एवं समय-समय पर प्रिजरवेटिव का प्रयोग करना चाहिए। 

3.Dust:-

 Dark room की समय-समय पर सफाई करते रहना चाहिए, जिससे कि Developer & fixer में धूल आदि के कण नहीं पहुँच सके । 

4.Time:-

 Developer & Fixer को प्रभावित करने वाले कारकों मे Time बहुत Important कारक होता है यदि डार्करूम के अंदर प्रोसेसिंग में अधिक समय लगायेँगे । तो Latent image  Quality पर विपरित प्रभाव पड़ता है और latent image की blacking & whitening का Ratio बिगड़ जाता ह। अत: Film की processing पर्याप्त समय में ही पूर्ण कर लेनी चाहिए। Manual processing 2-4 minute में पूरी हो जाती है तथा Auto processing में 90 Sec का समय लगता है। 

5.Lenght of Solution:-

 Latent Image से विज़िबल इमेज  जल्दी या देर से बनने की प्रक्रिया इस बात पर निर्भर करती है कि बनाया गया Solution कितने दिन पुराना है। यदि Solution नया ह तो latent image का निर्माण भी जल्दी होता। यदि solution पुराना ह तो latent image का निर्माण देर से हौता है।

Constitutes of developer and fixer

Developer-:

डेवलपर को हम  डेवलपिंग सॉल्यूशन भी कहते हैं इसका वर्क फिल्म प्रोसेसिंग में लेटेंट इमेज को विजिबल इमेज में बदलना है। इसका मुख्य कार्य एक्सपोज हो चुके सिल्वर हेलाइड क्रिस्टल्स को मैटेलिक सिल्वर में बदलना है। 
 डेवलपर में चार रसायनिक तत्व होते हैं जो कि निम्न है

1. Carbonic reducing agent( developing agent)

यह metol एवं  hydroquinone का मिश्रण होता है । metol  developing के दौरान अधिक तेजी से कार्य करता है तथा फिल्म में उपस्थित ग्रेन के  हल्के shadow को डार्क करता है।  अर्थात् एक्सपोज हो चुके सिल्वर हैलाइड को मैटेलिक सिल्वर हैलाइड में बदलता है। और अंतिम detail (  maximum information about the internal part of the body)  प्रदान करता है । metol  लेटेंट इमेज को grey विज़िबल इमेज में परिवर्तित करता है । डेवलपिंग के दौरान हैड्रोक्विनोने metol की तुलना में धीमी गति से कार्य करता है तथा फ़िल्म को उचित कंट्रास्ट ( ratio of blacking and  whitening)  प्रदान करता है । आजकल metol की जगह phenidone को उपयोग में लेते हैं । 

2. Activator (alklizer) 

सोडियम कार्बोनेट (Na2Co3) तथा सोडियम हैड्रॉक्साइड (NaoH) एक्टिवेटर का कार्य करता है ।  alkalizer को accelerator (त्वरक) भी कहते हैं । यह डेवलपर सोल्युशन को क्षारीय माध्यम प्रदान करता है । यह पदार्थ फ़िल्म के इमल्शन को फुलाते है जिससे को डेवलपिंग एजेंट इमल्शन में आसानी से प्रवेश कर सके । साथ ही साथ यह इमल्शन से क्रिया के पश्चात मुक्त हुए पदार्थो को बाहर निकलता है । यह सिल्वर क्रिस्टल को आकर्षित करता है । 

3. Restrainer

पोटेशियम ब्रोमाइड (KBr) एवं पोटेशियम आयोडाइड एंटीफोगिंग एजेंट रिस्ट्रेनर का कार्य करता है।  यह पदार्थों को केवल उन सिल्वर हैलाइड क्रिस्टलो से क्रिया करने देता है जो xray एक्सपोजर के द्वारा एक्सपोज हो चुके हैं। यदि डेवलपिंग सोल्यूशन में रिस्ट्रेनर नहीं मिलाएंगे तो  ऐसे सिल्वर क्रिस्टल भी मैटेलिक सिल्वर में बदल जाएंगे जो कि एक्स-रे से एक्सपोज नहीं हुए थे । जिससे कि अधिक लोग का निर्माण होता है जिसे डेवलपमेंट फोग कहते हैं।

4. Preservative

Sodium sulfite (Nas) preservative का कार्य  करता है । यह Corbonic Reducing Agent को हवा द्वारा  आक्सीकृत (Oxidation) होने से बचाता है । अर्थात Developer की Age वढाता ह। Developer में उपस्थित agent - hydroquinone हवा के प्रति अधिक संवेदशनशील होता है। ऑक्सीकृत developer का color भुरा हो जाता है। अत: Dcveloping कार्य पूर्ण होने के पश्चात् इन slution को ढककर रखना चाहिए। जिससे कि इन solution में Air अथवा dust particales प्रवेश न कर सके । 

Replacement 

लगातार प्रयोग से Developing solution कमजोर हो  जाता हैं तथा टैंक में इसका आयतन भी कम होता जाता है। इसलिए Developer की कम हुई शक्ति  तथा आयतन को पूरा करने के लिए एक विशेष solution इसमें मिलाया जाता है । इसे Replacement कहते है। इससे Developer की गुणवत्ता एवं age फिर से बढ़ जाती है। रिपलेसमेन्ट  सोल्यशन में ब्रोमाइड (Br) नहीं होता । क्योंकि एक्सरे फिल्म processing के दौरान यह film  से निकलकर Developer में पहले से ही इकट्ठा रहता हैं। तथा रिपलेसमेंन्ट सॉल्युशन मे Hydroquinone, metol तथा क्षार (alkaline) की मात्रा अधिक होती है। क्योंकि एक्सरे फिल्म प्रोसिंग के दौरान डवलपर के लगातार प्रयोग से इनकी मात्रा कम हो जाती है। अतः Replacement पदार्थों को डवलपर में मिलाने पर इसकी नष्ट शक्ति पुनः प्राप्त की जा सकती है।

Fixer

Development के उपरान्त प्रात हुई विजिबल इमेज को  Fixer के द्वारा परमानेट fixed किया जाता है। साथ-ही-साथ Deveiping के पशचात् फुली हुई (Swelled soft film) को फ़िक्सर  के द्वारा हार्ड किया जाता है।इसके अलावा fixer का उद्देश्य undeveloped एवं unexposed सिल्वर  हेलाइड क्रिस्टल को film से निकालना होता है।
 Fixing solution में निम्नलिखित केमिकल होते है- 

1.Fixing Agent:- 

Fixing agent के रूप में पाउडर वाले फ़िक्सर में सोडियम थायो सल्फेट तथा लिक्विड वाले फिकसर में अमोनियम थायो सल्फेट का प्रयोग किया जाता है। फिक्सिंग एजेन्ट फ़िल्म से undeveloped एव unexsposed सिल्वर ब्रोमाइ(Agbr) तथा सिल्वर आयोड़ाइड (Agi) क्रिस्टल्स को निकालकर फ़िल्म को साफ करते है तथा फिक्सिंग एजेंट मेटेलिंक सिल्वर को फिल्म के developed तथ exposed हुए भागो मे फ्री कर देते है।

2.Preservative:-

 सोडियम सलफाइड (Na2S) Preservative  कार्य करता है। यह fixing agent को खराब  होने से बचाता है । ताकि फ़िल्म को साफ रखा जा सके। 

3. Hardner:-

 फिक्सर सोल्यूशन में हार्डनर पदार्ध के रूप में क्रोमएलम या पोटेशियम एलम (KCr (SO4)2. 12(H2O) का प्रयोग किया जाता ह। हार्डनर पदार्ध फिल्म के emulsion  तथा जिलटिन को टाइट करते है । साथ ही-साध फिल्मों को खरोचों (scratch) से बचाते हैं। 

4. Acid:-


 Fixer  सॉल्युशन में अम्लों के रूप में एसेटिक अम्ल (CH3COOH) या सल्फ्यूरिक अम्ल (H2SO4) का प्रयोग किया जाता है । यह xray फिल्म की फिक्सिंग के दैरान फिल्म में बचे हुए क्षार को उदासीन (Neutralize) कर देते है। साथ-ही-साथ फ़िक्सर में उपस्थित हार्डनर पदार्ध क्रोमएलम या पोटेशियम एलम (KCr (SO4)2.12(H2O) के लिए पर्यास माध्यम प्रदान करता है।

Silver recovery method

Silver recovery method in hindi 

Radiology department में फ़िक्सर का कार्य फिल्मो से undeveloped एवं unexposed सिल्वर हैलाइड क्रिस्टल को  निकालना होता है। एवं डेवलपिंग के दौरान लेटेंट इमेज से बनी विसिबल इमेज को permanently fixed करना होता हैं। प्रत्येक फ़िल्म पर एक सिल्वर की परत चढ़ी होती है । फ़िक्सर के मुख्य कार्यो के दौरान darkroom में फ़िक्सर के टैंक में धीरे धीरे सिल्वर के कण टैंक के तले में सूक्ष्म मात्रा में बैठते जाते हैं। इन फ़िक्सर कंटेंट का amount इस बात पर निर्भर करता है कि सोलुशन में कितनी ज्यादा मात्रा में xray फिल्मे धोई जा रही है ।
  जितनी अधिक मात्रा में फिल्मो को डार्करूम में धोया जाता है। उतनी ही ज्यादा चांदी की मात्रा फ़िक्सर  सोल्युशन से प्राप्त होती है। जब बहुत ज्यादा मात्रा में सिल्वर फ़िक्सर सोल्युशन में हो जाते हैं तो इसके बाद इस सोल्युशन से और अधिक फिल्मो की फिक्सिंग नही की जा सकती है । जब फ़िक्सर सोल्युशन में सिल्वर की मात्रा बहुत ज्यादा बढ़ जाती ह तो इसे हाइपोसोल्युशन कहते हैं हाइपोसोलुशन में सिल्वर की मात्रा 6-10 ग्राम/लीटर होती है । इसकी सांद्रता जांच करने के लिए silver Estimation(चांदी आकलन) पेपर का प्रयोग किया जाता है। silver estimation paper की मदद से सांद्रता जांच करना बहुत आसान है इसके लिये  एक छोटा सिल्वर estimation paper लेते हैं तथा इसको हाइपोसोलुशन में डुबोते है जिसके कारण इस पेपर का रंग बदल जायेगा ।
  इसके बाद इस रंग की तुलना कलर चार्ट से कर ली जाती है तथा सांद्रता ज्ञात कर लेते हैं । इसके द्वारा सांद्रता ग्राम/लीटर में ज्ञात होती है ।  इसमे बहुत कम समय लगता है। सिल्वर एक कीमती धातु होती है,  तथा इसका jewellery, डेंटिस्ट्री, फोटोग्राफी, मिरर्स, ऑप्टिकस तथा इंडस्ट्रीज में बहुत ही व्यापक रूप से उपयोग होता है । अतः सिल्वर की रिकवरी इंडस्ट्रियल, केमिकल व इकोनॉमिकल रूप से फायदेमंद होती है |एक फोटोग्राफी फिल्म की कीमत का अधिकांश भाग सिल्वर का होता है ।
फ़िक्सर सोल्युशन से सिल्वर रिकवरी निम्नलिखित विधियों द्वारा की जाती है

1. Metallic replacement method 

इस प्रकार की सिल्वर रिकवरी मेथड के अनुसार फ़िक्सर सोल्युशन में मैटेलिक replacement एजेंट  आयरन , जिंक , कॉपर आदि मिलाये जाते हैं। तथा साथ ही साथ 5-6% नाइट्रिक एसिड भी मिलाया जाता है। इस विधि में सोल्युशन का ph लेवल 5-7 होना चाहिए। 
इस विधि की सहायता से लगभग 98% सिल्वर रिकवर हो जाती है । मेटैलिक रिप्लेसमेंट एजेंट ( Fe , Zn , Cu ) के द्वारा फ़िक्सर परस्पर क्रिया के फलस्वरूप सिल्वर के कण अलग अलग होने लगते हैं। यह सिल्वर रिकवरी की पर्याप्त विधि होती है । यह पूरी प्रक्रिया 50-60 मिनट में पूरी कर ली जाती है । तथा इस दौरान सोल्युशन का तापमान 90°C होना चाहिए। इस विधि को  cementation process भी कहा जाता है ।

2. Electronic method 

इस विधि के द्वारा पूर्ण रूप से ऑटोमैटिक या अर्धऑटोमैटिक मशीन के द्वारा फ़िक्सर सोल्युशन से सिल्वर को रिकवर किया जाता है । इस विधि के अंदर एक बड़ा टैंक होता ह जिसके अंदर हाइपोसोल्युशन भरा होता है । इसी टैंक के अंदर  एनोड तथा कैथोड लगे होते हैं । एनोड कार्बन या ग्रेफायड का बना होता है तथा कैथोड स्टेनलेस स्टील या मिश्र धातु की प्लेट का बना होता है । इस टैंक के अंदर इलेक्ट्रिक धारा प्रवाहित कीया जाता है जिसके पश्चात सिल्वर के कण electrolytic recovery unit में उपस्थित स्टेनलेस प्लेट की ओर आकर्षित होने लगते हैं । इस विधि के द्वारा भी 98% सिल्वर रिकवर किया जाता है । इस प्रकार की विधि का उपयोग ऐसे स्थानों पर किया जाता है जंहा पर हाई वॉल्यूम में फ़िक्सर का उपयोग हो रहा हो अथार्त अधिक  फिल्मो की प्रोसेसिंग की जा रही हो । 

3. Chemical method 

इस विधि में सिल्वर को रिकवर करने के लिये केमिकल/रसायन का प्रयोग किया जाता है । इन रसायनों में सल्फाइड का प्रयोग किया जाता है । सामान्यतः sodium sulphied , potassium sulphide , boro-hydride , sodium dithionite का प्रयोग किया जाता है । इन रसायनों को हाइपोसोलुशन में मिलने पर मैटेलिक सिल्वर "गाज " के रूप में फ़िक्सर सोलुशन के टैंक के तल में बैठ जाते हैं । इसके बाद इस मेटैलिक सिल्वर को फ़िल्टर पेपर की सहायता से छानकर अलग कर लेते हैं । तथा इसे पिघलाकर ईंटो के रूप में ढाल लेते है । जिससे चमकदार सिल्वर प्राप्त होती है ।



Mountaning of Intensifying screen in the cassette

Mountaning of Intensifying screen in the cassites

 Cassites के अंदर intensifying, screen को mountaining करना बहुत important process होता है यदि mountaning गलत तरीके से कर दी जाए तो film की गुणवत्ता पर प्रभाव पड़ सकता है।  कैसिट्स में स्क्रीन की mountainig इस प्रकार करते है कि सबसे पहले cassites के front portation में front intensifying screen को mount करते है। स्क्रीन के अच्छी तरह से चिपकने के पश्चात cassette के back portion में back screen को चिपकाते ह। Mountaining करते समय extermal adesive material का उपयोग नहीं करते है। क्यांकि नई (New) screen की पिछली सतह पर adesive की strip inbuilt लगी हुई आती है। जिसे हटाकर स्क्रीन को कैसिट्स में चिपकाते है। 
Screen की mountainig करने के बाद इसके किनारों को cotton pad से समान रूप दबाते जिससे यह अच्छी तरह से कैसिट्स से चिपक जाती है। intensifying screen की mountainig करने के बाद cassette को बंद करके कुछ समय के लिए रख देते है। लगभग 10-12 घण्टे तक कैसेट का उपयोग नहीं करते है जिससे कि स्क्रीन की proper fixing हो सके ।Screen की mountainig  करते समय Radiographer के हाध गीले नही होने चाहिए जिससे कि स्क्रीन पर दाग धब्बे आदि न लगें। उपरोकत सभी बातों का ध्यान रखते हुए itensifying स्क्रीन की  mountaining करते है।

Care of intensifying Screen

Care of intensifying Screen

Intensifying screen का योगदन Radiology विभाग में बहुत  important होता है। क्योंकि यह X-Ray photon को light photon में परिवर्तित करती है। तथा इन्हीं लाइट फोटोन से एक्सरे फिल्म पर लेटेन्ट इमेज का निर्माण होता है। अत: intensifying screen की care निम्न प्रकार करनी चाहिए।
- Intensifying screen को Heat से दूर रखना चाहिए  क्योंकि heat से screen की दक्षता (Eficiency) पर प्रभाव पड़ता है।
- डार्करूम में कार्य के दौरान itensifying screen पर Scratch आदि नहीं लगने चाहिए। अन्यथा इससे फिल्मों पर आर्ट इफेक्ट की सम्भावना बनती है। अतः डार्करूम में कार्य करने वाले रेडियोग्राफर को अपने नाखून छोटे रखने चाहिए । एवं कार्य के दौरान हाथों में ring  नहीं पहननी चाहिए । जिससे की स्क्रीन पर खरोच  आदि नहीं आती है।
- फिल्मों की लोडिंग के समय रेडियोग्राफर को गीले हाथो से स्क्रीन को स्पर्श नहीं करना चाहिए। 
-स्क्रीन को प्रोसेसिंग रसायन जैसे Developer, fixer, water आदि से दूर रखना चाहिए। अन्यथा स्क्रीन पर धब्बे आदि लगने की सम्भावना बनती है।
- कैसिट्स मे Intesifying screen को लोड करते समय फ्रन्ट एवं बैक दोनों स्क्रीनों को एक साथ लोड करना चाहिए । जिससे एक्सपोजर में होने वाली गडबडियों के बचा जा सके ।।
-Screen को समय-समय पर cotton pad आदि से साफ करते रहना चाहिए। जिससे की Dust partical आदि  sereen पर न चिपक सके।
- यदि कैसिट्स काफी समय से उपयोग में न आ रही हो तो स्क्रीन की  front and back screen के बीच मे white paper रख देने चाहिए।
- जिस स्थान पर स्करीन रखी हुई हो उस स्थान के ऊपर फ़िल्म व hanger नहीं लटकाने चाहिए।
- स्कीन को कभी भी खूली अवस्था में नहीं छोडना चाहिए। अन्यधा यह डेमेज हो सकती है। 
-स्क्रीन को हमेशा तभी उपयोग करना चाहिए जब यह या तो नई (New) या फिर साफ-सुधरी हो अन्यथा फिल्मों की इमेज मे Arteffect  आ सकते है।

Loading and care of cassette

Loading and care of cassette


loading the cassette


सर्वप्रथम कैसेट को लोड करने के लिए डार्क रूम में लाते हैं तथा कैसेट को ड्राई बेंच पर रख देते हैं। ऐसा करते समय आपके हाथ बिल्कुल साफ होने चाहिए। डार्क रूम का दरवाजा बंद करते हैं तथा सेफ लाइट को ऑन करते हैं। तथा वाइट लाइट को ऑफ करते हैं। इसके बाद स्प्रिंग क्लिप को यूज करते हुए  कैसेट को ओपन करते हैं तथा स्लाइड करते हुए फिल्म को कैसेट के अंदर लोड कर देते हैं। सुनिश्चित करते हैं  की फिल्म लोडेड करते समय overlap ना हो।  इसके बाद कैसेट तथा फिल्म बॉक्स को बंद कर देते हैं। कभी भी कैसेट को लॉक नहीं करना चाहिए जब तक कि उसमें फिल्म लोड ना हो। अब लोडेड कैसेट को   hatch में रख देते हैं। कैसेट hatch दो भागों में बटा हुआ होता है। एक भाग में एक्सपोज़ हुए फ़िल्म बॉक्स को रखते हैं तथा दूसरे भाग में बिना एक्सपोज़ हुए फ़िल्म बॉक्स को रखते हैं। 


Care of cassette 


-कैसेट को लोड करते समय इसकी सतह पर स्क्रैच न  लगने दे। 
- कैसेट की सतह को गिला न होने दे। 
- कैसेट को साफ करने की डेट को डॉक्यूमेंट करे। 
-इसे सावधानीपूर्वक हैंडल करें। 
- कैसेट को स्टोरेज के लिए vertical या standing  पोजीशन में रखें।
-कैसेट को गर्म जगह पर या हिट्स उसके पास स्टोर न करें। 
- कभी भी कैसेट को खुला न  छोड़ें। 
-ध्यान रखें कि कैसेट को पुनः लोड करते समय इंटेंसिफाइंग स्क्रीन सुखी हो या गीली ना हो। 
- कैसेट को रिप्लेस करते समय इसे bottom edge  से पकड़े। 
-इससे लाइट टाइटनेस के लिए नियमित रूप से चेक करें। 
- कैसेट के अंदर स्क्रीन तथा फिल्म के संपर्क या कांटेक्ट को भी चेक करना चाहिए। 


Automatic film processor

Automatic film processor in hindi

Automatic processing के द्वारा एक्सपोज्ड xray फिल्मो की कम समय मे अच्छी गुणवत्ता के साथ डेवलपिंग एवं फिक्सिंग की जाती है। प्रोसेसिंग सोलुशन(developer, fixer and water ) ऑटोमैटिक प्रोसेसर के अलग अलग टैंक में उचित आयतन में रखा जाता है । जिसमे की सबसे पहले टैंक में डेवलपर को उसके बाद फिक्सर को रखा जाता है। तथा पानी को रखा जाता है। तथा इसके बाद में dryer होता हैं। जो कि फिल्मो को सुखाने का कार्य करता है। इस पूरी प्रोसेसिंग में मात्र 90 सेकंड का समय लगता है ।
ऑटोमैटिक प्रोसेसर मशीन में सभी सोल्युशन पहले  से भरे व pre-mixed होते हैं। मशीन की प्रतिमाह या प्रतिसप्ताह एक आउटसाइड कंपनी द्वारा जांच व maintenance की जाती है। 

Essential/part of automatic processor

1. Transport mechanism 

Automatic processor में अलग अलग प्रकार के रोलर होते हैं जो कि एक्सपोज्ड फिल्मो को अलग अलग मार्गो ( डेवलपर, फ़िक्सर , पानी, ड्रायर) से गुजारने का कार्य करते हैं। इन रोलर की गति पूरी प्रक्रिया में समान होती है। जिससे कि प्रत्येक भाग से फ़िल्म निश्चित समय मे अच्छी तरह से होकर गुजरे। इस क्रिया में रबर रोलर एवं फिनोलिक रोलर अपना योगदान निभाते हैं। 

2. processing chemical

Processing chemical को  automatic processor में निम्न परिवर्तनो की आवश्यकता होती है
A. सोलुशन का कंसन्ट्रेशन बढ़ाकर रखा जाता हैं।जिससे कि अलग अलग भागो में प्रोसेसिंग टाइम कम से कम लगे। hydroquinone तथा phenidone का प्रयोग डेवलपिंग एजेंट के रूप में जबकि मैन्युअल प्रोसेसिंग में phenidone के स्थान पर metol का प्रयोग किया जाता है।hydroquinone तथा phenidone लेटेंट इमेज को विज़िबल इमेज में बदलते हैं।   
B. Processing solution का ताप बढ़ा कर रखा जाता है जिससे कि प्रोसेसिंग में गति बड़े जिससे टाइम कम लगे अतः डेवलपिंग फिक्सिंग तथा वाशिंग में तापमान 35 डिग्री या 95 डिग्री फॉरेनहाइट रखा जाता है तथा ड्राइवर का तापमान 57 डिग्री या 135 डिग्री फॉरेनहाइट रखा जाता है जिसकी वजह से फिल्में ऑटोमेटिक प्रोसेसर से 90  सेकंड मैं ही सुख कर बाहर आ जाती है उच्च ताप पर प्रोसेसिंग के लिए इनमें anti-fog एजेंट एल्डिहाइड मिला देते हैं
C. एक्स-रे फिल्म  developing के दौरान मुलायम होकर फुल जाती है अतः फिल्म को रोलर से मुलायम होकर चिपकने से बचाने के लिए कुछ विशेष हार्डनिंग रसायन  डेवलपर में मिलाया जाते हैं। exa-: glutaraldehyde,potassium bromide
D.  automatic processor मैं प्रोसेसिंग के दौरान फिल्म के इमल्शन की मोटाई समान रूप से एक  रहनी चाहिए जिससे कि यह रोलर की सहायता से सोलुशन  के बीच से आसानी से गुजर सके इसके लिए डेवलपिंग सोल्यूशन में सल्फेट मिलाए जाते हैं जिससे इमल्शन की स्वेलिंग या फूलना कम से कम होता है।
E. डेवलपर तथा फिक्सर  का रिप्लेसमेंट समय-समय पर करते रहना चाहिए जिससे कि  डेवलपर की क्षारीयता तथा फिक्सर की अम्लीयता बनी रहे।

3. Transport system of automatic processor

 automatic  प्रोसेसर मैं केमिकल की उचित मिक्सिंग का कार्य संचार तंत्र द्वारा होता है संचार तंत्र  से डेवलपर एवं फिक्सर का आयतन बना रहता है एवं पानी का संचार तंत्र टैंक के द्वारा होता रहता है तथा स्वच्छ पानी ऑटोमेटिक प्रोसीजर मैं आता रहता है

4. Processor maintenance 

Automatic processor की समय-समय पर सफाई करते रहना चाहिए जिससे कि ऑटोमेटिक प्रोसेसर में किसी प्रकार की खराबी नहीं आती है लगातार प्रयोग से automatic processor में रोलर में  रुकावट आ सकती है एवं समय-समय पर ऑटोमेटिक processor का रिप्लेसमेंट भी करते रहना चाहिए जिससे कि फिल्म की गुणवत्ता बनी रहे ।


Automatic processor के लाभ

1. ऑटोमेटिक प्रोसेसर में बहुत ही कम समय में एक्सपोज फिल्मों की डेवलपिंग  फिक्सिंग तथा वाशिंग हो जाती है लगभग 90 सेकंड के समय में फिल्म प्रोसेसिंग पूरी हो जाती है साथ ही साथ सुख कर फिल्म बाहर आ जाती है।
2. ऑटोमेटिक प्रोसेसर के द्वारा उच्च गुणवत्ता की एक्सपोज फिल्म की डेवलपिंग एवं फिक्सिंग की जाती है क्योंकि इसमें टेंपरेचर का निर्धारण अच्छी तरह  से होता है।
3.  ऑटोमेटिक प्रोसेसर के द्वारा रेडियोलोजी विभाग की गुणवत्ता एवं कार्य क्षमता बढ़ाई जाती है अर्थात इसके प्रयोग से बहुत कम समय में उच्च गुणवत्ता की फिल्म प्राप्त की जा सकती है



Darkroom illumination

x-ray Darkroom illumination

Darkroom मैं तीन प्रकार  के illumination  होना चाहिए

1. Safe light 

2. Normal light

3.radiographic illumination

1.safe light

सुरक्षित  प्रकाश  डार्क रूम  को  इल्यूमिनेट  या प्रदीप्त  करने के लिए  काम में आने वाली  विशेष  लाइट  है  जो  एक्स-रे फिल्म को प्रभावित नहीं करती है यह लाइट स्त्रोत सुरक्षित वेवलेंथ का प्रकाश प्रोवाइड करती है जिससे कि डार्क रूम में काम किया जा सके साथ ही यह एक्स-रे फिल्म मैं अन्य प्रकार की रेडियोग्राफिक फिल्म की लोडिंग डेवलपिंग व स्टोरिंग की प्रक्रिया को भी प्रभावित नहीं करती है डार्क रूम में सेफ लाइट के रूप में green yellow Brown light use मैं ली जाती है सेफ लाइट  या सुरक्षित प्रकाश को डार्क रूम लाइट भी कहते हैं। 
इस  लाइट से डार्क रूम में काम भी किया जा सकता है तथा फिल्म fogging का निर्माण भी नहीं होगा। safe light तथा फिल्म के बीच कम से कम 1.2 मीटर   की दूरी होनी चाहिए।

Safe light specifications

सेफ लाइट के लैंप की hight 201mm , width 315mm तथा depth 167mm होती है। इसके लिये 220-230V  की पावर सप्लाई की जरूरत होती है। इसका बल्ब 8-9 वाट का होता है। इस लाइट के सामने एक फ़िल्टर का उपयोग किया जाता है जिससे की प्रकाश की wavelength कम हो जाये। 

Safe light की जाँच

सेफ लाइट की समय-समय पर जांच करते रहना चाहिए ।  सेफ लाइट की जांच करने के लिए एक  unexposed x ray film  लेते हैं । तथा इस फ़िल्म पर  एक धातु का सिक्का रख देते हैं। ध्यान रखे कि डार्करूम  बाकी सभी लाइट ऑफ होनी चाहिए । तथा सेफ लाइट ऑन होनी चाहिए। कुछ समय के लिए सिक्के को फ़िल्म पर रखे रखते हैं। इसके बाद फ़िल्म को प्रोसेस करते हैं । जैसा कि चित्र में दिखाया गया है अगर फ़िल्म पर सिक्के की इमेज बनती ह तो इसका मतलब ह की सेफ लाइट improper ह अर्थात सही नही है। अगर फ़िल्म पर सिक्के की इमेज ना बने तो सेफ लाइट बिल्कुल ठीक है।
darkroom illumination in hindi



निम्न प्रकार की फिल्मों को सेफ लाइट में expose न करे-:
Panchromatic black and white film 
Duplicating film
High speed infra red film

Types of safe light 

A.Direct safe light
B.Indirect safe ligh

A.Direct safe light
प्रकाश सीधा वर्क सरफेस पर डाला जाता है। working surface से कम से कम 4 फ़ीट की दूरी आवश्यक है। यह फ़िल्म लोडिंग तथा अनलोडिंग के लिए उपयुक्त है। 
B.Indirect safe light
इसका प्रयोग डार्करूम के जनरल इल्लुमिनाशन के लिए किया जाता है। इसमें प्रकाश की दिशा छत की तरफ रखी जाती है। 

2. Normal light

Normal लाइट अर्थार्त 100 वाट के बल्ब का उपयोग होता है। यह आमतौर पर घरों में प्रयोग होने वाली नार्मल लाइट होती है। तथा यह नार्मल काम जैसे क्लीनिंग सोलुशन  तथा सोलुशन को बदलने के लिए काम मे ली जाती है। 

3. Radiographic illumination 

एक फलुओरोसेंट इल्लुमिनाशन की व्यवस्था गीली फ़िल्म को देखने के लिये वाशिंग compatment के ऊपर ही होनी चाहिये जिससे सोल्युशन एक दूसरे में मिल न सके।

speed/factor affecting the speed/type of screen

speed/factor affecting the speed/type of screen

Speed of film 

फ़िल्म पर फलुओरोसेंट मेटेरियल लगा होता है  जिससे स्क्रीन पर रेडिएशन गिरने पर यह उसे लाइट फोटोन में कन्वर्ट कर देती है । इंटेंसिफयिंग स्क्रीन को अधिक फ़ास्ट तब कहा जाता है जब यह बहुत कम एक्सपोजर पर अच्छी गुणवत्ता की इमेज प्रदान कर सके अर्थार्त कम mas तथा kv पर भी फ़िल्म पर उपयुक्त कंट्रास्ट(optimum ratio of blacking and whitening ) प्राप्त हो सके।  
          Speed = 1/exposure

 Intensification factor

बिना स्क्रीन एवं स्क्रीन के साथ फिल्म को समान डेंसिटी प्रदान करने  मैं लगने वाले एक्सपोजर रो का अनुपात इंटेंसिफिकेशन फैक्टर कहलाता है।
  IF = बिना स्क्रीन के एक्सपोज़र/स्क्रीन के साथ एक्सपोज़र
Note-: intensification factor किसी इंटेंसिफयिंग स्क्रीन के लिए हमेशा एक से अधिक नही होता है। 

Factor affecting the speed of intensifying screens-:

Intensifying screen की स्पीड निम्न फैक्टर पर निर्भर करती है-

1.intrinsic factor(आंतरिक कारक)

यह निम्नलिखित है
A. Structure of phosphor(फॉस्फर की संरचना)
इंटेंसिफयिंग स्क्रीन की स्पीड को फॉस्फर की रचना प्रभावित कर सकती है। अर्थार्त स्क्रीन की स्पीड इस बात पर निर्भर करती ह की किस प्रकार का फॉस्फर स्क्रीन में प्रयुक्त किया जा रहा है। कैल्शियम tungsted x ray फोटोन को लाइट फोटोन में अच्छी तरह से बदल देता है। अतः स्क्रीन में फॉस्फर पदार्थ के रूप में कैल्शियम tungstate का प्रयोग किया जाता है।
B. Thickness of the phosphor 
फॉस्फर पदार्थ की मोटाई जितनी अधिक होती है इंटेंसिफयिंग स्क्रीन की स्पीड भी उतनी ही अधिक होती है । परंतु एक लिमिट से ज्यादा फॉस्फर की मोटाई बढ़ाने पर intensification factor पर उल्टा प्रभाव पड़ता है। 
C. Size of the crystal
इंटेंसिफयिंग स्क्रीन मैं फॉस्फर के रूप में प्रयुक्त कैल्शियम tungstate का आकार जितना बड़ा होगा स्क्रीन की स्पीड भी उतनी ही अधिक होगी। 
D. Reflective layer
रेफ्लेक्टिव लेयर स्क्रीन की स्पीड बढाती है। परंतु साथ साथ इमेज का resulation भी कम करती हैं। 

2. Extrinsic factor ( बाह्य कारक) 

स्क्रीन की स्पीड को प्रभावित करने वाले बाह्य कारक निम्न है
A. Temperatures(तापमान)
तापमान बढ़ने पर इंटेंसिफयिंग स्क्रीन की स्पीड घटती ह परन्तु फ़िल्म की स्पीड बढ़ जाती है।
B. Kv (किलो वोल्टेज) 
किलो वोल्टेज बढ़ाने पर इंटेंसिफयिंग स्क्रीन की स्पीड बढ़ती है।
Types of intensifying screen

Speed के आधार पर इंटेंसिफयिंग स्क्रीन निम्न प्रकार की होती है । 

1. Fast screen

Fast स्क्रीन में बहुत कम एक्सपोज़र में ज्यादा मात्रा में लाइट फोटोन का उत्सर्जन होता है। लेकिन इसमे कुछ सूक्ष्म डिटेल गायब हो जाती है क्योंकि इसमें phospher लेयर मोटी होती है तथा फॉस्फर के क्रिस्टल का साइज भी बड़ा होता है। इससे पेशेंट को रेडिएशन डोज़ भी कम लगता है।

2.slow screen

इसमे जब रेडिएशन स्क्रीन पर गिरती है तो यह बहुत कम लाइट फोटोन उत्सर्जित करती है  क्योंकि इसमे फॉस्फर लेयर की मोटाई कम होती है तथा फॉस्फर क्रिस्टल की साइज भी कम होता है। लेकिन इससे रेडियोग्राफिक डिटेल अच्छी प्राप्त होती है । slow स्पीड स्क्रीन से पेशेंट को रेडिएशन डोज़ अधिक लगता हैं। 

3.medium speed screen

यह स्क्रीन का तीसरा प्रकार है। इसमें फॉस्फर लेयर की मोटाई , फॉस्फर क्रिस्टल की साइज , राड़ियोग्राफिक डिटेल तथा पेशेंट रेडिएशन डोज़ उपर्युक्त स्क्रीनो के बीच का होता है।
इसके तीन प्रकार है
A. Standard या slow screen
स्टैण्डर्ड स्क्रीन में कैल्शियम टंगस्टेट को फॉस्फर के रूप में लिया जाता है । 
B. Rare earth / fast screen 
इस प्रकार की स्क्रीनों में फॉस्फर पदार्थ के रूप में रेयर अर्थ मेटेरियल का प्रयोग किया जाता है ।मैनुफैक्चर के द्वारा स्क्रीन का नाम और उसका type इसके ऊपर एक साइड में कोने पर प्रिंट किया जाता है। यह इंफॉर्मेशन राड़ियोग्राफ के ऊपर भी दिखाई देती है। गैडोलीनियम, लेन्थेनम तथा यीट्रीयम आदि रेयर पदार्थो को फॉस्फर के रूप में प्रयोग किया जाता है ।
 रेयर अर्थ फॉस्फर सबसे एफिशिएंस होता है। इस प्रकार की स्क्रीन की स्पीड बहुत अधिक फ़ास्ट होती है। परंतु इस प्रकार की स्क्रीन बहुत महंगी होती है क्योंकि इसमें रेयर अर्थ पदार्थों का use किया जाता है । ऐसे पदार्थों के बारे मे यह धारणा है कि  यह धातुएं धरती पर बहुत कम मात्रा में पायी जाती हैं। साथ ही खनन , निष्कर्षण एवं शोधन की प्रक्रिया भी बहुत जटिल और महंगी है। पूरी दुनिया का रेयर अर्थ धातुओं की आपूर्ति का सबसे बड़ा केंद्र चीन है। 
C. Combination screen
इस स्क्रीन में फॉस्फर स्टैण्डर्ड स्क्रीन में प्रयोग होने वाले फॉस्फर मेटेरियल तथा रेयर अर्थ पदार्थों  के कॉम्बिनेशन (mix) से बना होता है। इसकी क्रियाशीलता इन दोनों के बीच की होती है।

Manual processing of x ray film

Manual processing of x ray film in hindi

जब xray फ़िल्म को expose किया जाता है तो xray फ़िल्म पर लेटेंट इमेज का निर्माण होता है। xray फ़िल्म पर  बनी इस लेटेंट इमेज को विज़िबल इमेज में बदलने के लिये फ़िल्म की प्रोसेसिंग की जाती है। यह इमेज हमेशा के लिए विज़िबल रहती हैं। तथा इसे बिना किसी क्षय के वर्षों तक रखा जा सकता है । xray फ़िल्म की प्रोसेसिंग डार्करूम के अंदर की जाती है ।
फ़िल्म प्रोसेसिंग की निम्न स्टेप है-

1. Exposure 

सबसे पहले xray फ़िल्म को एक्सपोज़ किया जाता ह जिससे कि लेटेंट इमेज का निर्माण होता है । इस लेटेंट इमेज को हम आंखों से नही देख सकते हैं ।

2. Prepration 

सर्वप्रथम  exposed xray फ़िल्म को डार्करूम में लाते है तथा प्रोसेसिंग सोल्युशन का तापमान चेक करते हैं । सभी केमिकल को हिलाया जाता है। डार्करूम में developer टैंक लेफ्ट साइड में , बीच मे rinsing टैंक तथा right साइड में फिक्सिंग टैंक होता है । developer को साबुन जैसी प्रकृति से पहचाना जा सकता है तथा फ़िक्सर को सिरके जैसी गंध से पहचाना जा सकता है । अब कैसेट को अनलॉक करते हैं । कैसेट के अंदर से फ़िल्म को निकलते हैं इस दौरान पूर्ण सावधानी बरतते है। अब फ़िल्म को ड्राई बैच  पर रख देते हैं तथा पेंसिल की सहायता से फिल्म के टॉप राइट हैंड कॉर्नर पर पेशेंट नेम और पेशेंट नंबर लिख देते हैं इसके लिए एक स्पेशल फिल्म मार्कर भी यूज में लिया जाता है। फिल्म की  size के अनुसार फिल्म को अब फिल्म हैंगर में रखने के लिए फिल्म हैंगर लेते हैं फिल्म हैंगर में क्लिप की सहायता से फिल्म को सेट करते हैं।

3.Development

अब डेवलपर  का ढक्कन हटाते हैं तथा  फिल्म हैंगर को डेवलपर टैंक में डालते हैं तथा फिल्म हैंगर को पकड़ कर फिल्म को 5 सेंटीमीटर दो से तीन बार ऊपर-नीचे करते हैं उसके बाद फिल्म को डेवलपर मैं ही छोड़ देते हैं डेवलपर  के तापमान के अनुसार फिल्म developing मैं कितना समय लगेगा यह तापमान समय सारणी के अनुसार टाइमिंग क्लॉक में समय सेट  कर देते हैं और क्लॉक को स्टार्ट कर देते हैं  developing का समय नीचे दी गई सारणी के अनुसार है
  इसी समय के दौरान अपने सूखे हाथों से एक फ्रेश फिल्म filmbox से लेते हैं उस फिल्म को खाली कैसेट में लोड कर देते हैं तथा कैसेट  को क्लोज कर देते हैं कैसेट को कैसेट  hatch मैं रख देते हैं अब कैसेट दोबारा यूज़ लेने के लिए तैयार है घड़ी की घंटी बजने पर फिल्म तैयार हो चुकी है डेवलपर से फिल्म को बाहर निकालने के लिए  अब फिल्म हैंगर को पकड़ कर डेवलपर टैंक से बाहर निकालते हैं ऐसा करते समय ध्यान रखना चाहिए की  डेवलपर की बूंदे बाहर  तथा fixer solution  मैं नए गिरे। इस प्रक्रिया में exposed सिल्वर  halide   ब्लैक मैटेलिक सिल्वर में बदल जाता है।
 यह एक अभिक्रिया होती है जिससे अदृश्य छवि या लेटेंट इमेज की दृश्यता लाखों गुना बढ़ जाती है। डेवलपर क्षारीय प्रकृति  का  होता है  तथा  डेवलपमेंट  की प्रक्रिया  क्षारीय माध्यम में होती है ।इसके अंदर महत्वपूर्ण क्रिया silver आयन  का अपचयन होना होता है जिससे कि यह ब्लैक मैटेलिक सिल्वर में बदल जाता है
Ag+ + e- = Ag
 डेवलपर के अंदर phenidon  होता है जिससे कि ग्रेन या तो पूरा डेवलप होता है या बिल्कुल भी नहीं डेवलपिंग की प्रक्रिया सिल्वर हेलाइड ग्रेन के सेंसटिविटी स्पैक पर शुरू होती है किसी सिल्वर हेलाइड ग्रैन मे उपस्थित मैटेलिक सिल्वर डेवलपर सॉल्यूशन को डेवलपिंग एक्शन शुरू करने के लिए प्रेरित करता है अगर किसी मैटेलिक सिल्वर युक्त  silver halide grain  लेटेंट इमेज नहीं हो तो भी वह डेवलपिंग प्रोसेस दर्शाता है लेकिन यह प्रोसेस बहुत ही धीमी होती है ।

4. Rinsing 

 फिल्म को डेवलपमेंट के बाद फिल्म  को rinsing के लिए  पानी में 30 सेकंड के लिए डीप किया जाता है तथा इन 30 सेकंड में फिल्म को तीन से चार बार ऊपर नीचे किया जाता है ऐसा इसलिए किया जाता है जिससे की फिल्म पर लगा डेवलपर सोल्यूशन फिक्सर सॉल्यूशन के अंदर मिक्स ना हो।  इसमें क्षारीय  माध्यम का अभाव होने के कारण डेवलपमेंट प्रक्रिया भी रुक जाती है।  अगर फिल्म को rinsing  न किया जाए तो  डेवलपर सोल्यूशन फिक्सर सोल्यूशन में मिक्स हो जाएगा तथा डेवलपर  की क्षारीयता और फिक्सर की अम्लता क्रिया  करके उदासीन हो जाएगा ।  जिससे फिक्सर सोल्यूशन  निष्क्रिय हो जाएगा जिससे कि फिल्म की हार्डनिंग पर प्रभाव पड़ेगा ।  जिस से की कुछ ही हफ्तों में ब्राउन स्टेन  बन जाएंगे।  ध्यान रखें की इस प्रोसेस में वाइट लाइट ऑफ तथा सेफ लाइट ऑन होनी चाहिए।

5.fixing and hardening

 अब एक्स-रे फिल्म को  फिक्सर टैंक में  रखा जाता है  जहां पर  फिल्म को  हार्ड या फिक्सिंग की जाति है फिल्म को  फिक्सिंग टैंक में  कम से कम  5 मिनट तक  रखा जाता है  यदि  5 मिनट से ज्यादा रखा जाए  तो भी  फिल्म पर  कोई  प्रभाव नहीं होगा। फिक्सिंग सॉल्यूशन अन एक्सपोज  तथा undeveloped
 सिल्वर हेलाइड क्रिस्टल को एक्स-रे फिल्म  इमल्शन से हटाता है तथा इमल्शन को हार्ड बनाता है ।

6. Final Washing

 अब 5 मिनट के बाद फिल्म हैंगर को पकड़कर फिल्म को फिक्सर टैंक से बाहर निकाला जाता है तथा फिल्म को लार्ज washing tank  मैं वाशिंग के लिए रखा जाता है अब डार्क रूम में वाइट लाइट को ऑन कर सकते हैं लेकिन ध्यान रखना होगा कि सभी एक्स-रे फिल्म बॉक्स के ढक्कन बंद हो तथा सभी कैसेट क्लोज हो और कोई अन्य एक्स-रे फिल्म प्रोसेसिंग में ना हो ।  वाशिंग प्रक्रिया से फिल्म पर उपस्थित प्रोसेसिंग सोल्यूशन हट जाएंगे जिससे कि लंबे समय तक फिल्म के कलर में कोई परिवर्तन नहीं होगा फिल्म को वाशिंग टैंक में 30 मिनट तक रखा जाता है।

7. Drying 

 यह फिल्म प्रोसेसिंग की अंतिम स्टेप है इसके दौरान फिल्म को फिल्म हैंगर की सहायता से पकड़ कर वॉशिंग टैंक  से निकाला जाता है तथा फिल्म हैंगर को क्लिप के सहारे drying  रैंक पर लटका देते हैं। फिल्म को सुखाने के लिए ऐसे स्थान का चुनाव करते हैं जहां का फर्श टाइल्स का बना हो ना की लकड़ी का या फिर फर्श में धातु की ट्रे लगी होनी चाहिए लकड़ी से बने  फर्श को सोल्यूशन की बूंदे खराब कर देती है। फिल्म को सुखाने के लिए फैन भी काम में लिया जाता है तथा कैबिनेट ड्रायर  मैं पंखे के साथ एक हीटिंग एलिमेंट भी लगा होता है। फिल्म को सुखाने के बाद क्लिप से उतारते हैं तथा फिल्म हैंगर से फिल्म को निकालते हैं । पेशेंट का नाम जहां पेंसिल से लिखा था वहां वाइट स्याही से  दुबारा लिखते हैं डेड एंड पेशेंट हॉस्पिटल नंबर भी लिखते हैं सुनिश्चित करते हैं कि फिल्म के ऊपर राइट साइड में R तथा लेफ्ट साइड में L क्लीयरली इंडिकेट हुआ है या नहीं।